ग्रामीण विकास विभाग गरीबी उपशमन, रोजगार सृजन, ग्रामीण अवसंरचना, निवासियों के विकास, न्यूनतम बुनियादी सेवाओं के प्रावधान आदि के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक कार्यक्रमों का कार्यान्वन कर रहा है। विभाग द्वारा वर्तमान में कार्यान्विदत किए जा रहे महत्वतपूर्ण कार्यक्रम हैं:
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई)
स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना (एसजीएसवाई)
ग्रामीण आवास (इन्दिारा आवास योजना)
इस बात को ध्यांन में रखते हुए कि ग्रामीण सड़कें गांव में गरीबी उपशमन के लिए आर्थिक विकास और उपायों के लिए महत्वपूर्ण होती हैं, सरकार ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) नामक एक 100% केन्द्रीय प्रायोजित योजना शुरू की है। कार्यक्रम का उद्देश्य दसवीं योजना अवधि की समाप्ति तक अच्छी बारहमासी सड़कों के जरिए 500 से अधिक की आबादी वाले गामीण क्षेत्रो में सभी अलग-थलग पड़ी बसावटों को कनेक्टिेविटी उपलब्ध कराना है। पहाड़ी क्षेत्रों (पूर्वोत्त्र, सिक्कि़म, हिमाचल प्रदेश, जम्मूू व कश्मीर, उत्तरांचल) तथा मरुभूमि क्षेत्रों के संबंध में 250 से अधिक व्यक्ति यों वाली बसावटों को कनेक्ट करना है।
स्वुर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना (एसजीएसवाई) ग्रामीण गरीबों के लिए एकमात्र स्वैरोजगार कार्यक्रम है। दिनांक 1.4.1999 से अस्तितव में आई इस योजना की ग्रामीण गरीबों को स्वर-सहायता समूहों (एसएचजी) में संगठित करना तथा बैंक ऋण और राजसहायता तथा विपणन सहायता आदि के जरिए उनका क्षमता निर्माण करना, प्रशिक्षण, कार्यकलाप समूहों की योजना, आधारभूत ढांचा विकास, वित्तीय सहायता जैसे स्वरोजगार के सभी पहलुओं को शामिल करते हुए सामूहिक कार्यक्रम के रूप में परिकल्पूना की गई है।
आवास मनुष्य के लिए एक बुनियादी आवश्यकता है। इसलिए आवासों के निर्माण को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, जो 1980 में प्रारंभ हुआ था, के अंतर्गत मुख्य कार्यकलापों में से एक के रूप में शुरू किया गया था। इन्दिरा आवास योजना (आईएवाई) को आरएलईजीपी की एक उप-योजना के रूप में 1985-1986 के दौरान शुरू किया गया था और तत्पाश्चाुत् यह जवाहर रोजगार योजना की एक उप-योजना बनी रही। 1 जनवरी 1986 से आईएवाई को जेआरवाई से पृथक करके एक स्वातंत्र योजना बना दिया गया था। भारत सरकार ने 1988 में एक राष्ट्रीय आवास और पर्यावास नीति की घोषणा की थी जिसका उद्देश्य ''सभी के लिए आवास'' उपलब्ध कराना था तथा 20 लाख अतिरिक्त आवास इकाइयों (ग्रामीण क्षेत्रों में 13 लाख तथा शहरी क्षेत्रों में 7 लाख) का निर्माण करना था जिसमें गरीबों और उपेक्षितों को स्थाइयी लाभ दिलाना था। इसका उद्देश्य आवास की कमी को दूर करना तथा 11वीं योजना अवधि के अंत तक सभी कच्चेइ मकानों को पक्के घरों में बदलना था। इस कार्य-योजना को इन्दिरा आवास एवं पर्यावास मिशन जैसे विभिन्नम कार्यक्रमों के जरिए कार्यान्वित किया जाता है।
प्रशिक्षण ने विभिन्न गरीबी उपशमन कार्यक्रमों से संबंधित ग्रामीण विकास कार्यकलापों में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया है। चूंकि प्रशिक्षण, अनुसंधान एवं विकास एक दूसरे के साथ गहराई से जुड़े हैं, अत: नीति निर्माताओं और कार्यक्रम कार्यान्वयन करने वालों, दोनों के लिए यह शिक्षाप्रद बन गया है। यह सुविधा दिलाने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान (एनआईआरडी) प्रशिक्षण कार्यक्रम, कार्यशालाएं, संगोष्ठिनयां और अंतर्राष्ट्रीएय कार्यक्रमों का आयोजन कर रहा है। इसके अलावा, ग्रामीण विकास से संबंधित मुद्दों से निपटने के लिए अनेक प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थारनों को व्याापक सहायता उपलब्ध कराई गई है।
डीआरडीए को सुदृढ़ बनाने और उन्हें अधिक व्यावसायिक और प्रभावी बनाने के लिए शंकर समिति नामक एक अंतर मंत्रालय समिति की सिफारिशों के आधार पर 1 अप्रैल 1999 से डीआरडीए प्रशासन को लागू किया गया है। यह योजना प्रशासनिक लागत को कार्यक्रम निधियो का प्रतिशत आबंटन करने की पूर्व पद्धति के स्थान पर लागू की गई है। इसके अंतर्गत डीआरडीए, जिनसे योजनाओं को प्रभावी ढंग से प्रबंधित और कार्यान्वित करने की अपेक्षा की जाती है, के प्रशासनिक व्यय को पूरा करने के लिए एक पृथक प्रावधान किया गया है।
सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) जागरुकता सृजन करने, लोगों को एकजुट करने तथा परामर्श तथा लोगों को ज्ञान, कौशल और तकनीक प्रदान करके विकास में भागीदारी करने में अहम भूमिका निभाता है। मंत्रालय के विभिन्न कार्यक्रमों की सामूहिक संचार आवश्यकता को पूरा करने के लिए संचार के उपलब्ध मॉडलों का अधिकतम उपयोग करने की परिकल्प्ना से एक एकीकृत आईईसी कार्यनीति लागू की गई है ताकि मंत्रालय के कार्यक्रमों की संचार आवश्यककताओं को प्रभावी ढंग से पूरा किया जा सके।
विकास कार्यकलापों की निगरानी और मूल्यांनकन (एमएंडई) विभिन्न पणधारकों को इन कार्यकलापों के लिए पिछले अनुभव से सीखने, सेवा सुपुर्दगी योजना और आबंटन संसाधनों मे सुधार करने तथा मुख्य पणधारकों की जवाबदेही के भाग के रूप में परिणामों को प्रदर्शित करने के लिए बेहतर उपाय के रूप में कार्य करता है। पिछले वर्षों के दौरान मंत्रालय के कार्यक्रमों में निगरानी और मूल्यांकन नीति तथा पर्यावरण को लागू करने की एक व्या्पक बहु-स्तारीय, बहु-साधन प्रणाली विकसित की गई है। मंत्रालय के कार्यक्रमों के कार्यान्वुयन के व्याापक कार्यक्षेत्र को देखते हुए कार्यक्रम की निगरानी को विभिन्नि स्तारों पर उठाया जा रहा है।
राष्ट्रीय स्तिर पर सभी कार्यक्रमों की समग्र निगरानी, मंत्रालय के निगरानी प्रभागों द्वारा की जाती है। कार्यक्रम प्रभाग उनके द्वारा कार्यान्विरत संबंधित कार्यक्रमों की निगरानी करते हैं। मंत्रालय के कार्यक्रमों को मूल रूप से राज्य कार्यान्वययन एजेंसियों द्वारा कार्यानवित किया जाता है। राज्यस्तर पर कार्यक्रम से संबंधित सचिव/आयुक्तष इसकी निगरानी करते हैं। कार्यक्रम का वास्तविक कार्यान्वययन डीआरडीए, पंचायती राज संस्थायनों (पीआरआई) तथा अन्य कार्यान्वयन एजेंसियों के जरिए जिला/गांव स्त्र पर किया जाता है, जो बुनियादी स्तर पर कार्यक्रम के निष्पािदन की निगरानी करती हैं।
चूंकि कार्यक्रम का कार्यान्वएयन स्थानीय लोगों की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को प्रदर्शित करता है अत: पंचायती राज संस्थानों को मंत्रालय के कार्यान्वनयन हेतु एक महत्वपूर्ण साधन माना जाता है। योजना प्रक्रिया और कार्यक्रमों के कार्यान्वथयन के विकेन्द्रीकरण के एक उपाय के रूप में पंचायती राज संस्थानो को सुदृढ़ करने की परिकल्परना संविधान (73वां) संशोधन अधिनियम, 1992 के जरिए की गई है, और इस अधिनियम के पारित होने से पंचायती राज संस्थांनों (पीआरआई) को संवैधानिक दर्जा उपलब्ध9 कराया गया है। इसलिए, अधिकांश ग्रामीण विकास कार्यक्रमों के अंतर्गत पीआरआई को कार्यक्रम कार्यान्वोयन के लिए महत्वधपूर्ण भूमिका सौंपी गई है। स्थानीय शासन को सुदृढ़ करने, लोगों की भागीदारी सुनिश्चियत करने तथा पीआरआई के जरिए महिलाओं को अधिकार देने के लिए सतत् प्रयास किए जा रहे हैं। राज्य सरकारों को पीआरआई को पर्याप्तआ प्रशासनिक और वित्तीय अधिकारों के प्रत्या्योजन के लिए कहा जा रहा है तथा इस संबंध में पर्याप्तो परिवर्तन देखने में आया है।
चूंकि कार्यक्रम का कार्यान्वयन स्थानीय लोगों की आवश्यतकताओं और आकांक्षाओं को प्रदर्शित करता है अत: पंचायती राज संस्थनों को मंत्रालय के कार्यान्वयन हेतु एक महत्वपूर्ण साधन माना जाता है। योजना प्रक्रिया और कार्यक्रमों के कार्यान्वयन के विकेन्द्रीकरण के एक उपाय के रूप में पंचायती राज संस्था नों को सुदृढ़ करने की परिकल्परना संविधान (73वां) संशोधन अधिनियम, 1992 के जरिए की गई है, और इस अधिनियम के पारित होने से पंचायती राज संस्थांनों (पीआरआई) को संवैधानिक दर्जा उपलब्ध कराया गया है। इसलिए, अधिकांश ग्रामीण विकास कार्यक्रमों के अंतर्गत पीआरआई को कार्यक्रम कार्यान्वोयन के लिए महत्वधपूर्ण भूमिका सौंपी गई है। स्थानीय शासन को सुदृढ़ करने, लोगों की भागीदारी सुनिश्चियत करने तथा पीआरआई के जरिए महिलाओं को अधिकार देने के लिए सतत् प्रयास किए जा रहे हैं। राज्य सरकारों को पीआरआई को पर्याप्तआ प्रशासनिक और वित्तीय अधिकारों के प्रतया्योजन के लिए कहा जा रहा है तथा इस संबंध में पर्याप्तो परिवर्तन देखने में आया है। इस विभाग के अंतर्गत तीन स्वायत्तर निकाय है ं नामत: लोक कार्यक्रम और ग्रामीण प्रौद्योगिकी विकास परिषद (कपार्ट), राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थापन (एनआरडी) और राष्ट्रीय ग्रामीण सड़क विकास एजेंसी (एनआरआरडीए)।
लोक कार्यक्रम और ग्रामीण प्रौद्योगिकी विकास परिषद (कपार्ट) की स्थाैपना ग्रामीण विकास में स्वैछच्छिऔ एजेंसियों की भागीदारी को प्रोत्साणहित करने के लिए गठित करने और उन्हे उनकी ग्रामीण विकास परियोजनाओं में भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए वित्तीेय सहायता भी उपलब्ध कराई गई है। कपार्ट स्वैाच्छिंक एजेंसियों और उनकी परियोजनाओं से सीधे संपर्क में रहता है।
राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्था्न (एनआईआरडी) राष्ट्रउ स्तिरीय प्रशिक्षण की आयोजना और समन्वरय करता है। राज्य और जिला स्तरीय प्रशिक्षण के लिए क्रमश: राज्य ग्रामीण विकास संस्थाीनों (एसआईआरडी) और विसतार प्रशिक्षण केन्द्रोंल (ईटीसी) की वित्ती य सहायता उपलब्धा कराई जाती है।
राष्ट्रीय ग्रामीण सड़क विकास एजेंसी (एनआरआरडीए) को हाल में सोसायटी पंजीकरण अधिनियम 1860 के अंतर्गत पंजीकृत किया गया है, जो प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) को तकनीकी विशिष्टि6यों, परियोजना मूल्यां कन, अंशकालिक गुणवत्तार नियंत्रण निगरानीकर्ताओं की नियुक्तिक, निगरानी प्रणाली के प्रबंधन पर सलाह देता है तथा मंत्रालय को समय-समय पर रिपोर्टें प्रस्तु्त करता है।

